जानिए भारत के नागा साधुओं का इतिहास- नागा-साधू कैसे बनते हैं

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नागा साधुओं का परिचय :

दोस्तों नागा साधुओं का इतिहास भारत में अत्यंत प्राचीन है। ऐसा माना जाता है कि इनका उदय महावीर स्वामी  (जैन मुनि ) के काल में हुआ था किंतु इस विषय में विद्वानों में अत्यधिक मतभेद है। अगर देखा जाए तो जैन धर्म  बाद में दो संप्रदाय में बट गया था। यह दो संप्रदाय दिगंबर और श्वेतांबर कहलाए।

श्वेतांबर संप्रदाय के साधु श्वेत वस्त्र अर्थात सफेद कपड़े पहना करते थे जबकि दिगंबर संप्रदाय के साधु चाहे ठंडी हो या गर्मी, वर्ष भर बिल्कुल निर्वस्त्र रहा करते थे।
तब से नागा साधुओं की यह परंपरा आज तक चली आ रही है आज भी बहुत से लोग इस धर्म को स्वीकार करके नागा साधु बन जाते हैं।

लेकिन दोस्तों आपको यह बता दूं कि नागा साधु बनना इतना भी आसान नहीं है जितना दिखता है। नागा साधु बनने के लिए एक मनुष्य को शरीर की सीमाओं से आगे बढ़ना पड़ता है और भूख, प्यास व निद्रा का त्याग करना पड़ता है। नागा साधुओं ने समाज के कल्याण हेतु व मंदिरों और मठों की रक्षा हेतु बहुत से युद्ध लड़े हैं जिनका इतिहास आज कुछ खो सा गया है।

आइए जानते हैं नागा साधु बनने के कुछ मूलभूत नियम क्या है?
दोस्तों वर्तमान समय में भारत में सैकड़ों अखाड़े हैं जिनमें दीक्षा लेकर एक मनुष्य नागा साधु में बदल जाता है। 
प्रत्येक अखाड़े का नियम एक जैसा नहीं होता है परंतु कुछ मूल बातें सब में सामान पाई जाती हैं आइए जानते हैं-

ब्रह्मचर्य का पालन करना-

जी हां दोस्तों नागा साधु बनने के लिए सबसे मुख्य नियम यही है। नागा साधु बनने के लिए मनुष्य को पूरी तरह से कामवासना मुक्त होना अनिवार्य है। ऐसा व्यक्ति जो शारीरिक और मानसिक रूप से कामवासना पर विजय प्राप्त कर लेता है वही सच्चा नागा साधु बनने का अधिकारी होता है।

कुछ विशेषज्ञ ऐसा भी मानते हैं कि बचपन में ही बालकों की जननांगों की कुछ नसों को खींच कर उन्हें दुर्बल बना दिया जाता है इसलिए वह बड़े होकर अपने शिश्न इंद्री में उत्तेजना महसूस नहीं करते और वे नागा साधु बनने के लिए शारीरिक रूप से तैयार हो जाते हैं। यही कारण है कि नागा साधु के सभी नियम हठयोग पर आधारित होते हैं।

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वस्त्रों का पूर्णतया त्याग-

जी हां दोस्तों आपने संगम नगरी प्रयागराज, हरिद्वार, काशी, उज्जैन आदि में नागा साधुओं को अवश्य देखा होगा। ये नागा साधु शरीर पर भस्म लगाए बिल्कुल निर्वस्त्र अवस्था में घूमते टहलते या फिर योग मुद्रा का अभ्यास करते हुए दिखाई पड़ जाते हैं। कभी आवश्यकता पड़ने पर यह शरीर पर गेरुए रंग के वस्त्र कुछ समय के लिए धारण कर लेते हैं। आवश्यकता ना पड़ने पर दिन हो या रात ठंडी हो या गर्मी वर्ष भर यह नागा साधु बिल्कुल निर्वस्त्र अवस्था में विचरण करते हैं।

स्वयं का करते हैं पिंडदान-

जी हां दोस्तों बिल्कुल सही सुना आपने नागा साधु अपने जीवन काल में ही स्वयं का पिंड दान अवश्य कर लेते हैं। यह कार्य दीक्षा लेने से पूर्व ही करा दिया जाता है ऐसा करने के बाद ही उन्हें शिष्य के रूप में कोई गुरु स्वीकार करता है।

भस्म और रुद्राक्ष धारण करना-

जी हां दोस्तों नागा साधुओं द्वारा भस्म और रुद्राक्ष धारण करना भी अनिवार्य होता है। ऐसा माना जाता है रुद्राक्ष व्यक्ति के शरीर के चारों ओर एक सुरक्षा कवच या कुकून बनाता है जिससे वह बहुत सी प्रकार की परेशा

नागा साधु के सोने का नियम-

नियों से स्वता ही बच जाता है। नागा साधु विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते रहते हैं इसलिए रुद्राक्ष धारण करने से उन्हें नए स्थान पर नींद ना आने की समस्या से भी छुटकारा मिल जाता है।
नागा साधु शमशान से प्राप्त ताजी राख का प्रयोग भस्म के रूप में अपने पूरे शरीर पर लेप करने के लिए करते हैं। वे भस्म को ही जीवन का सार मानते हैं और इसे बहुत सम्मान देते हैं क्योंकि यह उनको जीवन की वास्तविकता से हर वक्त रूबरू कराता रहता है।

जी हां दोस्तों नागा साधु सोने के लिए सिर्फ और सिर्फ भूमि का इस्तेमाल करते हैं। सोने के लिए कोई भी नागा साधु खाट, पलंग, बेड, व चारपाई का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं कर सकता है। सभी नागा साधु के लिए यह भी एक अनिवार्य नियम है।


नागा साधु के लिए भोजन के नियम-

जी हां दोस्तों नागा साधु दिन में मात्र एक बार भोजन करते हैं। भोजन का प्रबंध करने के लिए प्रत्येक नागा साधु को अधिक से अधिक सात घर में भिक्षा मांगने का अधिकार होता है। यदि नागा साधु को इन सात घरों में से एक भी घर में भिक्षा प्राप्त ना हो तो उसे भूखे पेट ही सोना पड़ता है।

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नागा साधु के लिए गुरु मंत्र की दीक्षा-

प्रत्येक नागा साधु चाहे वह किसी भी अखाड़े से दीक्षा प्राप्त करें उसे गुरुद्वारा एक विशेष मंत्र दिया जाता है जिसे गुरु मंत्र कहा जाता है। प्रत्येक नागा साधु को इस गुरु मंत्र को धारण करने के बाद जीवन भर इस में आस्था रखते हुए इसका जाप करते रहना आवश्यक होता है। नागा साधु की दीक्षा व भविष्य की तपस्या इसी गुरु मंत्र के इर्द-गिर्द घूमती है।

नागा साधु के मन में सेवा भाव-

दीक्षा प्रदान करने से पूर्व गुरु द्वारा उस व्यक्ति विशेष की कड़ी परीक्षा ली जाती है जो दीक्षा प्राप्त करने की लालसा रखता है। इसके लिए गुरु उन्हें विभिन्न प्रकार के सेवा कार्य प्रदान करते हैं और व्यक्ति के मन में सेवा भाव, धैर्य, दया आदि के गुणों की पड़ताल करते हैं। इस प्रक्रिया में कई बार व्यक्ति को अपने 10 से 20 वर्ष भी लगाने पड़ सकते हैं। इसके पश्चात ही व्यक्ति को नागा समुदाय में शामिल किया जाता है।

नागा साधुओं का श्रृंगार-

जी हां दोस्तों नागा साधु भी श्रृंगार करते हैं लेकिन इनके श्रृंगार की सामग्री जानकर आप भी हैरत में पड़ जाएंगे। नागा साधु के श्रृंगार के मुख्य सामग्री भस्म है जो कि शव की ताजी राख होती है। इसके साथ साथ उन्हें दाढ़ी वह जटा को भी बढ़ाना पड़ता है जिसका वे अत्यधिक ख्याल रखते हैं। आपने देखा होगा बहुत से नागा साधु अपनी जटाओं को रुद्राक्ष हुआ फूलों से सजाते हैं।

नागा साधु के हथियार-

प्राचीन काल से ही नागा साधु कई युद्धों को लड़ते आए हैं। इसलिए नागा साधुओं को एक उत्तम लड़ाका भी माना जाता है। आपने देखा होगा बहुत से नागा साधु अपने साथ त्रिशूल, भाला, चिमटा जैसे हथियार रखते हैं। यह हथियार नागा साधु को जंगलों में जंगली जानवरों जैसे शेर, चीता, बाघ आदि से रक्षा करने में भी सहायता प्रदान करते हैं। वैसे तो अधिकांश नागा साधु शांत स्वभाव के होते हैं किंतु इन्हें उकसाने पर यह उग्र भी हो जाते हैं इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति इनसे बिल्कुल भी नहीं उलझते हैं।

#निष्कर्ष-

नागा साधुओं का इतिहास भारत की विरासत है। हालाँकि ये साधू संसार का त्याग कर चुके होते हैं किन्तु फिर भी हमें अपने दाइत्व का पालन करते हुए इनके अस्तित्व की रक्षा करनी चाहिए/धन्यवाद


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