जानिए आत्म ज्ञान क्या है? आत्म ज्ञान कैसे प्राप्त किया जाता है: Atma Gyan kaise Prapt kare

atma gyan kaise prapt kare

आत्म ज्ञान एक परिचय-

दोस्तों हममें से बहुत से लोगों ने यह बात अवश्य सुनी होगी कि मनुष्य जन्म का उद्देश्य आत्मज्ञान प्राप्त करके मोक्ष प्राप्ति करना है। मनुष्य जीवन में अनेकों संकट और कठिनाइयां पाई जाती हैं अतः परिणाम स्वरुप मनुष्य बुद्धिमान होने के कारण इन सभी संकटों और परेशानियों का समाधान जीवन भर ढूंढता रहता है। जब मनुष्य को कोई भी समाधान नहीं प्राप्त होता है तब वाह अध्यात्म की ओर रुख करता है।

वास्तव में अध्यात्म में ही एक ऐसा साधन है जिसके जरिए हम अपने सांसारिक जीवन की समस्त कठिनाइयों से ऊपर उठ सकते हैं क्योंकि जीवन में परेशानियां कभी समाप्त नहीं होती हैं। अतः उत्तम विकल्प यही होता है कि हम इन परेशानियों से स्वयं को ऊपर उठा लें। अध्यात्म हमें अपनी जीवनशैली में ऐसे सुधार करने के अवसर प्रदान करता है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

आत्म ज्ञान की परिभाषा और अध्यात्म :

आज के वर्तमान भौतिकवादी युग में अध्यात्म किसी उलझी हुई पहेली से कम नहीं है। जहां बात ईश्वर के अस्तित्व की आ जाती है तो अधिकांश लोग ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। यहां से जन्म होता है आस्तिक और नास्तिक विचारधाराओं का और संपूर्ण जगत दो भागों में बट जाता है। आध्यात्मिक व्यक्ति किसी भी धर्म का हो सकता है परंतु सब के उद्देश्य एक समान होते हैं। सच्चा अध्यात्मा वही है जहां एक जीव दूसरे जीव पर दया दिखाएं और उचित सम्मान दें। सच्ची अध्यात्म की परिभाषा तो बहुत व्यापक है किंतु इसके प्रमुख तत्व क्षमा दया प्रेम समभाव आदि है।

आत्म ज्ञान के लिए शरीर और मन :

जिस प्रकार एक व्यक्ति अखाड़े में लड़ने से पहले अपने शरीर को मजबूत बनाने के लिए कसरत आदि करते हैं ठीक उसी प्रकार अध्यात्म के अखाड़े में उतरने के लिए व्यक्ति को अपने मन और शरीर को मजबूत बनाना पड़ता है। मन और शरीर को मजबूत बनाने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले अपने शरीर को स्थिर करना सीखना पड़ता है तथा इसके पश्चात मन को स्थिर बनाने का प्रयास किया जाता है।

आत्म ज्ञान में गुरु का महत्त्व :

दोस्तों अक्सर लोग अध्यात्म व आत्म ज्ञान की प्राप्ति हेतु विभिन्न साधु मुनियों की आंख मूंदकर संगत करने लग जाते हैं। इस प्रकार बिना विचारे किसी भी व्यक्ति का अनुसरण करने पर ज्ञान तो दूर शिवाय धोखे के अलावा कुछ भी नहीं प्राप्त होता है। अक्सर यह बताया जाता है आत्मज्ञान बिना गुरु की सहायता के प्राप्त नहीं हो सकता है, यह बात सही भी है किंतु आप को यह सुनिश्चित कर लेना भी आवश्यक है के सम्मुख जो व्यक्ति है क्या वह सच में आपका गुरु बनने योग्य है अथवा नहीं। क्योंकि अध्यात्म जगत में बहुत से बहुरूपियों का समावेश हो चुका है इसलिए सही गुरु की तलाश हमें बहुत सोच समझकर ही करनी चाहिए।

आत्म ज्ञान की आवश्यकता :

बहुत से ग्रंथों में आपको यह ज्ञान प्राप्त हो जाएगा कि मानव तन ही मुक्ति का द्वार है क्योंकि मानव तन में ही आकाश तत्व पाया जाता है यही कारण है कि मनुष्य शरीर में ज्ञान की उत्पत्ति संभव हुई है। यदि ठीक प्रकार से देखा जाए तो मनुष्य तन समस्त प्रकार की विधियों सिद्धियों का एक पुंज है। हम सब इतने अधिक बहिर्मुखी हो गए हैं कि हम अपने अंदर झांककर अपने अस्तित्व को ही पहचानने में सक्षम नहीं है।

दोस्तों आपको यह बात बता दूं कि स्वयं की अनुभूति कर लेना है अर्थात अपनी आत्मा में उतर जाना ही आत्मज्ञान प्राप्त कर लेना होता है। इसका यह अर्थ है कि आप मन और माया दोनों से ऊपर उठकर स्वयं अर्थात आत्म निष्ठ हो गए हैं। पूरी तरह से आत्म निष्ठ हो जाने पर ही पूर्ण मुक्ति संभव है। 

आत्म ज्ञान का सफ़र :

आत्मज्ञान का सफर बहुत लंबा है किंतु असंभव बिल्कुल नहीं है हां कई बार मनुष्य को आत्मज्ञान प्राप्त करने में अपने कई जन्म लगाने पड़ते हैं। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि आपके प्रयास विफल हुए बल्कि आपके कर्म आपके कर्माशय में संचित रहते हैं और जन्म जन्मांतर तक आपके कर्म और भाग्य इन्हें कर्माशय के कर्मों के अनुसार चलते हैं।

आत्मज्ञान की तैयारी के लिए सबसे पहले अपने शरीर को शुद्ध बनाना पड़ेगा। इसके लिए हमें शाकाहार को स्वीकार करना होगा तथा अपनी वाणी में शुद्धता लानी होगी। वाणी की शुद्धता से तात्पर्य यह है कि हम अपने मन वचन या कर्म से किसी को दुख बिल्कुल भी नहीं पहुंचाएंगे। इसके लिए कुछ ऋषि मुनि हठयोग का प्रयोग करते थे। हठयोग का अनुसरण करते हुए वे वर्षों तक के मौन व्रत का पालन करते थे। मौन व्रत का पालन करने से इन ऋषि-मुनियों के संकल्प में अप्रत्याशित वृद्धि होती थी।

आत्म ज्ञान के लिए संकल्प शक्ति :

संकल्प शक्ति के द्वारा ही किसी भी कार्य को सिद्ध किया जाता है अर्थात जब आपकी संकल्प शक्ति मजबूत होगी तब आप कोई भी कार्य सरलता से सिद्ध कर पाएंगे। किसी कार्य को कुशलता पूर्वक कर लेना ही सिद्धि कहलाती है।

आत्म ज्ञान हेतु योग और ध्यान :

योग और ध्यान अध्यात्म के मार्ग में वह साधन है जो आपको मोक्ष की ओर ले जाने में अति आवश्यक है। ध्यान करने के लिए शरीर का स्वस्थ होना अति आवश्यक है इसलिए योग का अध्यात्म में बड़ा महत्व है। और दोस्तों कहा भी जाता है योग भगाए रोग। योग करते समय एक बात का और ध्यान रखना परम आवश्यक है के योगी व्यक्ति को धीरे-धीरे अपने भोगों को त्याग देना चाहिए। क्योंकि जहां भोग तहां योग विनाशा। अर्थात यदि व्यक्ति भागों में उलझा रहेगा तो वह कभी भी योग नहीं कर पाएगा। बात यहां तक भी कहीं गई है कि कोई योगी व्यक्ति जिसके पास अत्यधिक योग बल हो यदि वह भी लोगों में उलझ जाए तो उसका योग बल शून्य हो जाता है।

आत्म ज्ञान के लिए मन की स्थिरता :

योग द्वारा शरीर की स्थिरता प्राप्त कर लेने के बाद बात आती है मन की स्थिरता की। मन की स्थिरता प्राप्त करने हेतु आपके अंदर और बाहर की हलचल को शांत करना पड़ता है। जैसा कि आप सभी जानते हैं ध्यान साधना हेतु एकांतवास की आवश्यकता होती है। इसके लिए हमारे प्राचीन ऋषि मुनि जंगलों और गुफाओं को उत्तम स्थान मानते थे। क्योंकि साधारण मनुष्य जंगल और गुफाओं में जाने से कतराते थे इसलिए हमारे प्राचीन ऋषि मुनि दुर्गम स्थानों पर अपनी योग साधना किया करते थे।

वैसे तो ध्यान लगाने के 112 अलग-अलग मार्ग (कुल ११८ मार्ग हैं जिनमे से ६ गुप्त हैं) हैं और यह मार्ग हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग प्रकार से लाभदायक हो सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार एक योग का मार्ग सुनिश्चित होता है तथा इसी सही मार्ग को अपना करके ही व्यक्ति अपने लक्ष्य अर्थात मुक्ति को प्राप्त कर सकता है।

आत्म ज्ञान और योग सिद्धियाँ :

बहुत से व्यक्ति योग साधना कुछ विशेष प्रकार की सिद्धियां प्राप्त करने हेतु करते हैं। इन सिद्धियों का उद्देश्य कुछ व्यक्तियों के लिए अपने जीवन को सरल बनाना और किसी की सहायता या परमार्थ कार्य करना होता है। वही कछ व्यक्ति इन सिद्धियों का प्रयोग नकारात्मक कार्यों को करने के लिए करते हैं।

जैसा कि मैंने आपको बताया यह मनुष्य तन ऊर्जा और शक्ति का भंडार है इसकी और आगे व्याख्या करते हुए अब मैं आपको इन शक्ति के केंद्रों के बारे में बताता हूं-

यदि आपने बचपन में शक्तिमान नाम का एक धारावाहिक देखा हो तो आपको याद आएगा के मनुष्य के शरीर में शक्ति के सात चक्र पाए जाते हैं। मनुष्य की आध्यात्मिक शक्तियां इन सात चक्रों में वास करती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति यह चाहता है कि उसके यह सभी चक्र जागृत हो जाएं और वह इन शक्तियों का मालिक बन जाए। बहुत से लोग अपने चक्रों को जगाने के लिए गुरु बनाते हैं और उनसे चक्र को जागृत करने का आग्रह करते हैं। ऐसा गुरु जिसके अंदर अत्यधिक योग बल होता है वह व्यक्ति के सभी चक्रों को जागृत कर सकता है किंतु इस प्रक्रिया में गुरु को अत्यधिक योग बल गवना पड़ता है।

आत्म ज्ञान और कुण्डलिनी शक्ति :

वास्तव में यह योग बल ही सूक्ष्म शरीरों से मुक्ति का कारण बनता है। मनुष्य की मृत्यु के पश्चात उसे सूक्ष्म शरीर प्राप्त होते हैं और इस प्रकार वह अभी भी बंधनों से पूर्णतया मुक्त नहीं होता है। इन सूक्ष्म शरीर को योग बल जलाकर नष्ट करता है इसलिए ज्ञानी और योगी व्यक्ति अपने योग बल को व्यर्थ ही नष्ट नहीं करता है।
जब ही बात अध्यात्म की आती है तो यहां पर कुंडलिनी शक्ति पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है।

कुंडलिनी शक्ति एक ऐसी शक्ति है जो समस्त प्राणियों में ऊर्जा के संचार को निर्बाध रूप से जारी रखती है। मुख्य रूप से शरीर के सातों चक्रों का वेधन कुंडलिनी शक्ति के द्वारा ही किया जाता है अर्थात शरीर के सातों चक्रों को कुंडलिनी शक्ति जागृत करती है। मूलाधार से लेकर सहस्त्र सार चक्र कुंडलिनी शक्ति की यात्रा के कारण ही जागृत होते हैं।

आत्म ज्ञान और चक्र साधना :

शरीर के कुछ चक्र आसानी से जागृत हो जाते हैं वहीं कुछ चक्र जागृत करने में हमें कई वर्ष लग जाते हैं। चक्रसिद्ध प्राप्त करने के लिए सबसे पहले हमें कुंडलिनी शक्ति को जागृत करना होता है। किंतु कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने से पहले हमें अपने प्राणों को नियंत्रित करना होता है। हमारे शरीर में जो वायु तत्व है यह विभिन्न प्रकार की वायु में विभक्त हो जाती है जैसे प्राण तत्व, धनंजय वायु, किरकिल वायु आदि।

आत्म ज्ञान और प्राण वायु :

साधक को सबसे पहले इन वायु तत्व के विभिन्न रूपों को नियंत्रित करना पड़ता है। चक्र पर ध्यान करके हम इस प्राण तत्व को संवेदना या गुदगुदी के रूप में महसूस कर सकते हैं। प्राण तत्व को शरीर के किसी भी भाग पर महसूस किया जा सकता है किंतु चक्रों पर इसका प्रभाव अधिक देखा जाता है। ध्यान की कला किसी विज्ञान से कम नहीं है। जब साधक का ध्यान स्थिर होने लगता है तब वह समाधि में जाने के योग्य बनने लगता है। समाधि की अवस्था ध्यान की पराकाष्ठा मानी गई है।

आत्म ज्ञान और समाधि :

समाधि की अवस्था में ही साधक को योग बल प्राप्त होता है। जब कुंडलिनी शक्ति समस्या चक्रों का भेदन करके आगे बढ़ती है तो यह अपनी पराकाष्ठा को प्राप्त करके हृदय चक्र में स्थिर हो जाती है। जब कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है तब इसकी अनुभूति साधक को अलग-अलग प्रकार से हो सकती है। किंतु अधिकांश साधकों को इसकी अनुभूति रीढ़ की हड्डी में महसूस होती है। साधकों को अपनी कमर या रीड की हड्डी में गर्मी महसूस होती है तथा कई साधकों को चींटी के काटने जैसा एहसास होता है।

आत्म ज्ञान और मंत्र उच्चारण :

कुंडलिनी साधना के लिए कुछ गुप्त मंत्रों का भी प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक मंत्र में एक विशेष प्रकार का कंपन पाया जाता है जिसकी वजह से वह हमारे शरीर के ऊर्जा चक्रों पर अपना प्रभाव डालते हैं। सही मंत्र उच्चारण से भी कुछ मात्रा में योग बल प्राप्त होता है और चक्र जागृत होते हैं।

अध्यात्म के इस मार्ग में सच्चा गुरु वही है जो इन सभी पड़ाव से सफलतापूर्वक गुजर चुका हो। किंतु ऐसे गुरु आपको कम ही देखने को मिलेंगे अधिकांश व्यक्ति पुस्तकों से पढ़कर ही व्याख्या करते हैं जिसके कारण हम सही ज्ञान से वंचित रह जाते हैं। सच्चा ज्ञान वही है जिस की अनुभूति हम अपने वास्तविक जीवन में कर सकें तथा जिसका प्रैक्टिकल किया जा सके।

आत्म ज्ञान में इंगला-पिंगला  नाडिओं का महत्त्व :

दोस्तों अध्यात्म के मार्ग में आपने इंगला पिंगला नाडिओं का नाम अवश्य सुना होगा। वास्तव में हमारी नाक के बाएं द्वार को इंगला कथा दाएं द्वार को पिंगला कहा जाता है। इसके मध्य में भी एक सूक्ष्म मार्ग होता है जिसे सुषुम्ना कहते हैं। योग और अध्यात्म में सुषुम्ना नाड़ी का बड़ा महत्व है। हमारे योगी मुनि सुषुम्ना नाड़ी में अपने प्राणों को स्थिर कर लिया करते थे।

यदि प्राचीन उदाहरण देखे जाए तो महर्षि वेदव्यास ने ऐसा करके ज्ञान प्राप्त किया था। योग और ध्यान की अवस्था में आपकी आपकी आत्मा चैतन्य अवस्था प्राप्त करने लगती है। जब चेतनता की प्रथम अवस्था प्राप्त होती है तो इसे प्रज्ञा अवस्था कहा जाता है। जब यह अवस्था और अधिक श्रेष्ठ बन जाती है तो यह महाप्रज्ञा अवस्था कहलाती है। वास्तव में आत्मज्ञान आत्मा की चैतन्यता का ही विषय है।

जब संसार का नशा उतरता है तो जो भी कुछ सम्मुख होता है वह आत्म ज्ञान होता है। संसार का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि जो हमें अपने नेत्रों से दिखाई पड़ रहा है बल्कि एक संसार आपके स्वयं के भीतर भी है जिसमें आप प्रतिदिन जीते हैं। जब हम अंदर और बाहर दोनों संसारों से ऊपर उठ जाते हैं तर्क वितर्क को पीछे छोड़ देते हैं तो जो कुछ भी शेष बचता है वही आत्मज्ञान है।

आत्म ज्ञान प्राप्ति का अनुभव :

आत्मज्ञान की प्राप्ति कुछ ऐसे प्राप्त होती है जैसे मानो व्यक्ति नींद से उठ बैठा हो। कई बार ऐसा भी होता है कि जब हम अच्छा स्वप्न देख रहे होते हैं तो हम उस स्वप्न से बाहर आना नहीं चाहते हैं। इस प्रकार जीवन के सुख एक अच्छे स्वप्न की तरह है जो आज नहीं तो कल समाप्त हो जाएंगे। वही इसके विपरीत जो व्यक्ति कष्ट में है दुख में है वह इससे बाहर निकलना चाहता है अर्थात वह नींद से जागना चाहता है। इस प्रकार जब नींद खुलती है तो हमें सही ज्ञान प्राप्त होता है और सपने को भूल कर हम वास्तविकता में जीते हैं।

आत्म ज्ञान में आत्मा की गति :

जिस प्रकार अग्नि अपने स्रोत सूर्य से मिलने के लिए ऊपर की ओर उठती है और जल अपने स्रोत समुद्र से मिलने के लिए नीचे की ओर बहता है उसी प्रकार हमारी आत्मा अपने स्रोत ईश्वर से मिलने के लिए अत्यंत व्याकुल रहती है। बस हमें आवश्यकता है तो एक ठहराव की ताकि हम संसार के नशे से बाहर निकल सकें और आत्मानुभूति कर सकें। एक आत्मज्ञानी व्यक्ति अपना कल्याण तो करता ही है साथ ही साथ वह जगत का भी कल्याण करता है। 

वास्तव में विभिन्न रोगों की उत्पत्ति अलग-अलग प्रकार के भोगों से हुई है और कहा भी गया है जहां भोग तहां रोग। आत्म कल्याण हेतु हमें धीरे-धीरे भोगों को त्याग देना होगा। भोगो को त्यागने से प्रकृत में भी संतुलन बना रहता है। वर्तमान समय में मनुष्य आवश्यकता से अधिक भोग कर रहा है इसलिए प्रकृति का संतुलन भी डगमगा रहा है।
To Be Continued...

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